Saturday, 30 August 2014

आवारगी

मत ढूंढ मुझे सादगी में;
हूँ मैं भी अब कहीं,
आवारगी में;
बेशर्मी लिये फिरता हूँ, ऐ हवा अब तू ही बता;
खुद होकर दवा,
मर्ज़ लिये फिरता हूँ ||
इतनी आवारगी!! क्यों शहर में,
क्या सो गये सभी, आज दोपहर में,
आवारगी शहर की,
सड़कों पर;
भाग रही बेखबर,
हर घड़ी हर पहर,
जाऊँ, तो कहाँ जाऊँ?
बेचैनी सी दफन सीने में,
लिये फिरता हूँ, ऐ हवा;
अब तू ही बता,
खुद होकर घटा,
प्यास लिये फिरता हूँ||


इतनी नफरत क्यों शहर में?,
क्या गिर चुके लोग खुद ही की नज़र में?,
आग दिल में है,
दिलों को जलाते हैं लोग,
खुद बुझकर, दूजे को जलाते हैं रोज;
क्या जलन है?,
क्यों जलन है?,
इसलिये ही बस जनम है?;
जलन लिये फिरता हूँ, ऐ हवा!,
अब तू ही बता,
खुद होकर चराग;
अंधकार लिये फिरता हूँ||
इतने भ्रष्ट!  क्यों शहर में,
क्या बिक चुके सेवक,
मलाई और शहद में;
वजन से दूजे के,
लोग अपने वजन को बढ़ाने में,
रक्षक ही जुटे हैं,
दावत अपनो की उड़ाने में,
अनजान सबसे,
यूं परेशान सा फिरता हूँ,  हवा!;
अब तू ही बता,
खुद होकर "वेद",
अज्ञान लिये फिरता हूँ||
इतनी दहशत! क्यों शहर में,
क्या घुस गये खौफ,
लोगों की नज़र में,
रख कंधों पर इक दूजे की,
बंदूकें चलाने में;
लोग हैं शहर के मशगूल,
लाशों के ढेर पर घरौंदे बनाने में;
बेखौफ सबसे,
जुदा सा फिरता हूँ, ऐ हवा!
खुद होकर बारूद,
बंदूक लिये फिरता हूँ||
इतना अन्याय! क्यों शहर में?,
क्या शहीद हुआ धर्म,
अधर्म से गदर में,
विश्वास बढ़ाकर, अपना बताकर,
घात लगाकर पास आने में;
लोग शहर के माहिर हैं "वेद",
जानकर भेद, बलि चढ़ाने में ;
आक्रोश लिये फिरता हूँ,
 ऐ हवा ! तू ही बता,
मुर्दों के शहर में, ज़िंदा,
मुर्दा बना फिरता हूँ||