Wednesday, 3 September 2014

The first attempt

भारत में सिविल सेवा परीक्षा सबसे जटिलतम परीक्षाओं में से एक मानी जाती है, वैसे तो परीक्षा की विषय वस्तु, पाठ्यक्रम आदि पूर्व निर्धारित हैं, पर सवालों के जवाब फिर भी नहीं बनते हैं| बहुत से अभ्यर्थियों के लिये प्रारम्भिक परीक्षा आज भी रहस्य है, तो बहुतों के लिये मेन्स, तो कुछेक के लिये इंटरव्यू |

मेरा अनुभव अभी अनुभव नहीं कहा जा सकता, पर मुझे गर्व है कि ये मेरा पहला प्रयास था, और पूर्ण विश्वास भी की असफलता मेरा वरण करने आयेगी|
Civil Services Examination
Examination

परीक्षा से पहले मैं सर्वज्ञानी भाव में स्थित था, जो कि प्रारम्भिक परीक्षा के रोज़ तक स्थायी रूप से स्थिर रहा, पर ज्यों ही परीक्षा केन्द्र पर पहुंचना हुआ मुझे बहुत से सर्वज्ञानी नज़र आने लगे, कुछेक की श्रेणियाँ तो महाज्ञानी पर पहुँची जान पड़ रही थी | कुछ हाँफते हुये आ रहे थे और कुछ काँपते हुये |

कुछ महाज्ञानियों ने तीन चार सर्वज्ञानियों को साथ लेकर स्वतंत्र सत्तायें स्थापित कर ली थी और आख्यानों का दौर शुरू हो चुका था जो परीक्षा हॉल में प्रवेश तक जारी रहा, मेरे बाजू से एक सर्वज्ञानी {नई दिल्ली में ट्रेंड } स्वतन्त्रज्ञानी के रूप में विरक्त से खड़े थे, कहने लगे कि पहले पेपर में सत्तर से अस्सी प्रश्न करना बेहद जरूरी है |{मुझे उनके भीतर स्वयं अग्रवाल साहब दिखाई दे रहे थे }, गार्ड कि आवाज़ से सहसा मेरा ध्यान भंग हुआ , जो सभी अभ्यर्थियों को भीतर प्रवेश के लिये आदेशित कर रहा था |

परीक्षा हॉल में प्रवेश करते ही एक अपूर्व शक्ति कि लहर मेरे भीतर दौड़ गयी | हॉल के भीतर दो पर्यवेक्षक मौजूद थे, एक पर्यवेक्षक ने मुझे यूं घूरा मानो कहना चाहता हो कि अब ये भी कलेक्टर बनेंगे ?

कुछ देर बाद प्रश्न पत्र का वितरण शुरू हुआ ,प्रश्न पत्र हाथ में आते ही मेरे हाथों ने स्वतः काम करना बंद कर दिया , प्रश्नो की प्रकृति रहस्यवाद पर आधारित थी जो-- प्रश्न दर प्रश्न और भी गहराता जा रहा था | मेरा सम्पूर्ण अर्जित ज्ञान प्रश्नो में ही निहित था, और मेरी हालत एक तूफ़ानी रात में मलक्का जलडमरूमध्य में फंसे नाविक जैसी हो चली थी |
कुछ प्रश्नो का चुनाव इतना ईको फ्रेंडली था कि एकबारगी तो मेरा मन वानप्रस्थ कि ओर मुड चला था क्योंकि पर्यावरण सम्बंधी इतना सटीक ज्ञान वन में रहकर ही अर्जित किया जा सकता है फिर भी अगले अटेम्प्ट और क़म उमर का हवाला देकर मैने अपने दिल को सम्हाल लिया |
मेरा ज्ञानाभिमान अब ग्लेशियर कि तरह पिघलना शुरू हो गया और मेरा शरीर ग्लोबल वॉरमिंग महसूस करने लगा था, वैश्विक तापमान कि तरह मेरा दैहिक तापमान भी उच्च होने लगा और इसके लक्षण पसीने के रूप में माथे पर उभरने लगे |
मुझे रुमाल से पसीना पोंछ्ता देख एक पर्यवेक्षक जो मुंह में पान दबाये हुये थे, बोले -'पेपर टफ है क्या' ?
मन में तो आया कि कह दूँ-" ये पेपर सिविल सेवा का है या वनस्पति सेवा का," पर फिर सोचा कहीं का गुस्सा कहीं निकालना ठीक नहीं, सो मैने अपने सेल्फ कंट्रोल का स्विच चालू किया और डेढ़ इंच की नकली वाली मुस्कान के साथ जबाब दिया-"नहीं ज्यादा टफ नहीं है ||" 
पाँच मिनट पहले बजने वाली घंटी से पाँच मिनट पहले ही मैने प्रश्न पत्र पूरा हल कर लिया था , और हॉल के परीक्षार्थियों के बीच 'अन्धों में काने राजा' वाला भाव भीतर ही भीतर महसूस करने लगा |

और फिर कुछ देर बाद घंटी बजी |

पेपर के छूटते ही एक कोलाहल चारों तरफ दौड़ पड़ा, परीक्षा के पहले जो अभ्यर्थी सदाबहार मेंग्रोव नजर आ रहे थे पेपर के छूटने पर अब वही कैक्टस बन चुके थे, मानो पानी की कमी के कारण पर्ण परिवर्तन हो गया हो |

पेपर कैसा भी था पर वास्तविकता को उज़ागर करने वाला था और चेताने वाला भी कि जब तक आपके समस्त ज्ञान चक्षु नहीं खुल जाते  आप आई .ए. एस. नहीं बन सकते | खैर जो भी था अच्छा था, पर इतना भी नहीं कि मैं कह सकता, अगले बरस तुम जल्दी आना

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