Friday, 12 September 2014

The Room

http://en.wikipedia.org/wiki/European_Hand_Fans_in_the_Eighteenth_Century



आज गौर से देखा कमरे को,
अलमारियाँ अब बुढ़ा चुकी हैं,
किताबों के ढेर, ढेर सारे,
बुलाते रहे जो मुझे कई दौरों तक,
इक नया  ठिकाना चाहते हैं,
किताबों के ये ढेर;
हैंगर पर लटके हुये कपड़े,
जलते हैं कुर्सी पे लटकी एक तौलिया से;
पर अच्छे हैं ये कपड़े,
जिन्हें इंसानों से कम वहम है,
कमरे के फर्श की शिकायत भी यूं अजीब है,
रोज़ रोज़ नहाना उसे अच्छा नहीं लगता,
पंखे से सुखाना अच्छा नहीं लगता,
यहाँ सब जलते हैं पंखे की ऊँचाई से |