Wednesday, 10 September 2014

Borrowed bottles

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उधार की बोतलों ने रातें सँवार दीं,
यूं कतरनों पे हमने जिंदगी गुजार दी,

ये सलीका क्या है जीने का? हमें ना आया;
ठिठुरती रातें सड़कों पे गुजार दीं,

होश क्या है होश में आयें तो हो मालूम,
कितनी रातें कितनी कब्रों नें तन्हा गुजार दीं;

ये हुस्न क्या, ये जवानी क्या;
जाने कितनों की चमक वक़्त ने उतार दी |