Tuesday, 2 September 2014

सहर





कुछ तो अंतर रहने दो,
कहीं मैं तुम एक ना हो जायें,
कुछ तो बातें रहने दो,
कहीं देर आज ना हो जाये,
क्या कह दूँ आज मनोरम कलरव;
और धूमिल गगन की बेला में,
पर ठहरो प्रिये! क्या जल्दी है,
कहीं अभी ठहर ना हो जाये,
इस नित्य नवल अहसास में,
मद्धम मद्धम उच्छ्वास में, 
देकर हाथों में हाथ; 
चल साथ दूर तक चलते हैं,
फिर कहीं सहर ना हो जाये।

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