Sunday, 12 February 2012

विवाह : जन्मांक (कुंडली ), संकल्प (दहेज़) और मध्यस्थ |


भारत  एक विशाल देश हैविशालता में अनेक विविधताएं भी समाई हुई हैं |
भारत के कस्बाई इलाकों का विकास हो न होलेकिन विवाह सुचारू रूप से होते हैं |
कस्बाई इलाकों में अगर लड़कियाँ एक निर्धारित उम्र के बाद घर पर ही बैठी रहें तो आस पड़ोस के लोग राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय मुद्दों को छोड़करविवाह में विलम्ब को ही मुद्दा बनाकर चर्चा शुरू कर देते हैं|

विवाह सम्बन्ध तय कैसे होते हैंआइए इस पर कुछ प्रकाश डालते हैं |
विवाह का तय होना तीन कारकों पर निर्भर करता हैजन्मांक (कुंडली )संकल्प (दहेज़) और मध्यस्थ |

जन्मांक और कुंडली का उल्लेख आगे आपको गहराई में प्राप्त होगाइसके पहले मैं मध्यस्थ के बारे में बताना चाहूँगा |

'मध्यस्थवह व्यक्ति होता है  जो  अपनी जवानी में लगाई-बुझाई का काम करता हैऔर उम्र का तकाजा हो जाने पर विवाह सम्बन्ध करवाने लगता है |
मध्यस्थ स्वभाव से ठलुआ होता है |

मैं पहले ही बताना चाहूँगा की मैं जिस क्षेत्र विशेष से सम्बन्ध रखता हूँ वहाँ दहेज़ और वर पक्ष का बोलबाला आरम्भ से ही रहा हैहो सकता है कि अन्य क्षेत्रों में परम्पराएं अलग अलग हों |

लड़की वाले सर्वप्रथम लड़के वालों के घर जाते हैंऔर लड़के के बारे में आवश्यक जानकारी जुटाते हैं (अमूमन मध्यस्थ द्वारा वह उन्हें पहले ही प्राप्त हो जाती है |)|
फिर भी अनभिज्ञता का नाटक एक अनिवार्य प्रथा होती है |

लड़के वाले लड़के को 'श्रवणकुमारके फ्रेम में प्रस्तुत करते हुए सारे समीकरण पहले ही एक 'पत्री'(राज ज्योतिषी द्वारा प्रमाणित ) में छपवा लेते हैं जिसको जन्मांक कहा जाता है |

लड़की वाला जन्मांक लेकर आता है और अपने राज ज्योतिषी (जिनकी दक्षिणा अमूमन ढाई-तीन सौ रुपये होती है ) को कुंडली मिलान हेतु देता है |

वैसे तो वर पक्ष संपन्न और लड़का अच्छे पद पर कार्यरत होता है तो कुंडली स्वमेव ही सिद्ध हो जाती है (३६ में से ३२ गुण भी मिल जाते हैं ) |

लड़की वाले, लड़के का जन्मांक मिलने के बाद ही लड़की कि कुंडली प्रस्तुत करेंइस प्रकार के अनिवार्य नियम का भी प्रावधान है |

इस प्रकार कुंडली के स्वमेव मिल जाने पर, लड़की वाला, मिली हुई कुंडलियाँ दिखाने के लिए लड़के वाले के घर ऐसे भागता है जैसे नब्बे के दशक की फिल्मों में जैकी श्रौफ़ नौकरी मिलने पर भागता था |

कुंडली मिल जाने पर (जबरन ही सही ) भी विवाह तय हो ही जाये यह सुनिश्चित नहीं रहता |

विवाह की सही सुनिश्चितता लड़की वाले के 'संकल्पपर निर्भर करती है |
लड़के वाला लड़की वाले से उसके संकल्प के बारे में संज्ञान लेता है |( वैसे तो पद के अनुरूप संकल्प निर्धारित कर दिए गए हैंजिससे संकल्प का मुद्दा आसानी से सुलझ जाता है | नवीनतम संकल्प दरें निम्नांकित छायाचित्र में संलग्न हैं  |)

संकल्प मनमाफिक होने पर विवाह धूम धाम से संपन्न हो जाता है|
विवाह के बाद लला (बच्चे ) की प्राप्ति एक अनिवार्य वरदान होती हैजो की नव विवाहित  वर वधु कठोर परिश्रम करके एक वर्ष के भीतर ही प्राप्त कर लेते हैं |
(अगर दम्पति समझदार हों और वरदान जल्दी नहीं चाहते होंतो यह उनके पौरुष और स्त्रीत्व पर प्रश्न चिन्ह लगा सकता है (जो की आमतौर पर कम ही देखने को मिलता है|) 

एक ओर जहाँ हम 'संस्कार  के दमभरते हैंकि विवाह तो संस्कार से होते हैंऔर जहाँ संस्कार होता है वहीँ रिश्ता होता हैवहीँ दूसरी ओर संकल्प के भी पक्षधर बनते हैं |
मैंने काफी नियमित चिंतन करने पर हर बार एक ही निष्कर्ष पाया किअब विवाह संस्कार से कम और संकल्प से कहीं ज्यादा अच्छे से होते हैं  |

जितना बड़ा संकल्प होता है उतना ही शानदार विवाह होता है