Wednesday, 8 February 2012

"सावधान" ! "आगे (साहब) कार्य प्रगति पर है !"

 Note: This is a guest post by Rahul Shukla.  



DISCLAIMER:


"I cannot confirm or deny that anything the following prose says,  has any connection to any matter true or false or any event that has, is, or will occur in the history of the universe. Name of the places are true but the facts are merely imaginary speculations for the sake of amusement of the reader. Any similarity to an event or  with an actual existing person(s) is purely coincidental."



                                                               "सावधान"

                                        "आगे कार्य प्रगति पर है !"


भारत अनिश्चितताओं का देश है , यहाँ कुछ भी निश्चित नहीं रहता ( बस अनिश्चित को छोड़कर !) | वैसे तो आज़ादी भी निश्चित नहीं थी, लेकिन देर-सबेर मिल ही गई | जैसे-जैसे देश की विकास प्रक्रिया आगे बढ़ी, नए नए विकास के क्षेत्र सामने आते गए , क्षेत्रों के विकास को सुचारू करना था , तो नए-नए विभाग भी अस्तित्व में आ गए | उन्हीं विभागों में से एक विभाग कहलाया 'निर्माण विभाग' | कहते हैं कि इस  विभाग का सूरज कभी अस्त नहीं होता, क्योंकि जीवन रुक सकता है, निर्माण कभी नहीं  रुकता | इस विभाग कि ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है, कि इस विभाग के 'साहब' जो कि सेवा-वर्गीकरण में तृतीय श्रेणी में आते हैं, प्रथम श्रेणी के अधिकारियों की सी हैसियत रखते हैं |

खैर छोडिये...अब कुछ चर्चा इनकी कार्यशैली पर करते हैं |

कहते हैं कि 'मानक' इनके  विभाग में 'मान्य' नहीं होते | अगर नियम कहते हैं कि निर्माण ३:१ से होना है तो ये १३:१ से करते हैं , और अपने कार्य कि पुष्टि इस सार्वभौमिक तर्क से करते हैं कि "परिवर्तन तो संसार का चचा (नियम) है" और  यदि हम पुख्ता इमारत बना कर देंगे तो वह कभी गिरेगी ही नहीं ; जब इमारत गिरेगी नहीं तो उसमें बदलाव कैसे होगा? फिर आप लोग ही कहेंगे कि निर्माण विभाग वाले मौसी ( प्रकृति ) को छेड़ते हैं! इस विभाग के टेंडर एक औपचारिकता मात्र होते हैं जो कि संविधान की इज्जत रखने के लिए कर दी जाती है, टेंडर तो पहले ही टेबल के नीचे खुल जाते हैं, टेबल के ऊपर औपचारिकता करने के लिए एक दिन सुनिश्चित कर दिया जाता है और उस दिन की शाम ठेकेदार जो 'विजेता' घोषित होता है , साहब के चाय-पानी का बंदोबस्त करता है | इस पार्टी में 'साहब' कि तारीफ़ में कसीदे गढ़े जाते हैं कि " परम दयालु-कृपावतार साहब १५  % वाला काम बस १०% में ही करवा देते हैं ; जय हो साहब की !"          

साहब की लीला बड़ी ही विचित्र होती है | साहब से मिलना प्रभु-मिलन के समतुल्य होता है : जब आप साहब से उनके घर मिलने जाते हैं तो साहब 'साइट' पर मिलेंगे और यदि 'साइट' पर मिलने जाते हैं तो वे 'घर' पर होते हैं ; यदि आप दोनों जगह एक साथ पहुँच भी जावें ( जो कि संभव नहीं दीखता ) तो साहब अपने दीवान- ए-ख़ास ( दफ्तर ) में पाए जाते हैं | 

इस विभाग की निर्माण-तकनीक समूचे विश्व के लिए शोध का विषय बनी  हुई  है | कुछ ही दिनों पहले अखबारों में एक खबर छपी थी कि चीन ने सिर्फ अठारह महीनों में सोलह सौ किलोमीटर लम्बी सड़क बना डाली, जो चीन को लगभग सात-आठ मुल्कों से जोडती है| इस खबर का जिक्र जब मैंने एक पड़ोस के 'साहब'(जो कि उस समय जर्दा घिसने में तल्लीन थे!) से किया, तो उन्होंने हल्के अंदाज में खीसें निपोरते  हुए कहा "इसमें कौनसी बड़ी बात है ? हम तो अपने ३६ वर्षों के कार्यकाल में ७२०० किलोमीटर लम्बी सड़कें ( सिर्फ कागजों में ही ) बना चुके हैं , वह भी 'नेशनल हाइवे' लेवल की!"

साहब का कहना है कि जब कृष्ण के कहने मात्र से ही जगत के पहले 'साहब' विश्वकर्मा जी तीन मिनट में तेरह महल उनके लंगोटिया यार सुदामा के लिए बना सकते हैं ; तो फिर हम तीस दिनों में बाँध और तीन दिनों  में भवन क्यों कर नहीं बना सकते ? आखिर परंपरा भी तो कोई चीज़ होती है | बिल्डिंग गिरे तो गिरे पर कमीशन के रेट न गिरें | टका ब्रम्हा, टका विष्णु , टका ही है महेश्वर, कलियुग में टका साक्षात् परब्रम्ह, इसलिए बस टके धर  !