Tuesday, 29 March 2011

Aum: The Symbol of Eternal Bliss!




ॐ एक ऐसा  शब्द है जो एक स्वतः स्फूर्त ध्वनि की नक़ल करता है  -  जैसे 'भौं ' कुत्ते के बोलने से जो ध्वनि होती है, उसकी नक़ल करता है  और 'चीं-चीं ' किसी चिड़िया के बोलने की नक़ल है I कहने का अर्थ यह है की ॐ को गलत समझा गया है I किसी ने  भी  इस  तथ्य  पर  भली    भांति  प्रकाश  डालने  का प्रयास नहीं किया कि ॐ एक संकेत मात्र है --एक महासत्य की ओर I

ॐ को सिर्फ एक पवित्र शब्द मान लिया गया --भ्रान्ति वश I हिंदुत्तव में लगभग हर मंत्र में ॐ को प्रयोग किया गया है I ॐ के बिना कहानी अधूरी है I किन्तु इतना महिमामंडित किये जाने के बाद भी , मूल सत्य , युगों युगों की रहस्मयी धुंध में छिप गया I

क्या था ॐ का रहस्य?

कठिन साधना के बाद, सबसे प्राचीन योगी ने, आदि  योगी ने(उसे शिव कहें या कोई और नाम दें !)--इस बात को जाना कि सृष्टि का, सारे अस्तित्त्व का सार ॐ है I महायोगी ने खोजा कि सारे नादों का श्रोत, मूल और सार ॐ है I उसने हमें यह बताने का प्रयास भी किया कि सारी   सृष्टि ॐ से उद्भूत हुई है और ॐ में ही लीन हो जावेगी I

योगी ने अपने अंतर में, अनवरत साधना के बाद इस तथ्य का साक्षात्कार किया था I महायोगी ने अपनी काया को कठिन साधना के बाद परिशुद्ध कर लिया और परम चेतना से जुड़ कर उन मनभावनी , दिव्य, किसी पार के लोक से आने वाली  ध्वनिओं को सुना I इन तरंगों को नाद के रूप में सुनकर योगी ने जाना कि कोई बाह्य ध्वनि इनके समकक्ष नहीं ठहरती क्योंकि ये इस लौकिक जगत के परे किसी जगत से इस काया में उतरतीं हैं I


ऐसीं सारी ध्वनियों को जब योगी अपने अंतर में सुनता रहा; अनवरत अनुसंधान करता रहा, तो उसे इन सबसे सूक्ष्म ध्वनि सुनाई दी I जैसे वैज्ञानिक अनुसंधान के फलस्वरूप सूक्ष्मातिसूक्ष्म अणु, परमाणु तथा मेसुन इत्यादि कि खोज कर पाए--ठीक उसी तरह योगी ने पाया कि इस से सूक्ष्म ध्वनि नहीं हो सकती, और इस परम नाद ने, जो किसी भी संघट्ट से पैदा नहीं होता, योगी को कल्याण दे दिया; उसे समाधि में पहुंचा दिया I चेतना के उच्चतम शिखर कि अनुभूति हुई योगी को I

यह चेतना का हिमालय था I   यह ईश्वर था I यह ब्रम्ह था I यह यात्रा का प्रारम्भ  और अंत था I यहीं जाने के लिए सारी यात्राएं थीं I यह कभी ख़तम न होने वाला आनंद था, शांति थी, माधुर्य था I इस अनुभव के लिए(या कहें अनुभव हीनता के लिए, समाधि के लिए) ही तो कितने लोगों ने युगों युगों तक तपस्या की थी I


इस परम आनंद की अवस्था में, समाधि के कल्याण को सब से बाँटनें के लिए, सारे संसार के लोगों को जाग्रति और मुक्ति देने के लिए --योगी ने सब को इस परम रहस्य से अवगत करना चाहा I जो भी उसे मिला उसने उसे यह बात समझाई I


परन्तु :

जैसा इतनी सारी गूढ़ बातों के साथ हुआ है, ॐ के साथ भी हुआ I यह रहस्य धीरे धीरे कर के विलुप्त ही हो गया I जन मानस इसे भूल गया और केवल चिन्ह पूजा ही परंपरा में बनी रही I सिर्फ मन्त्रों के पहले प्रणव को लगा दिया गया I


हमने ॐ को परम शक्ति का प्रतीक मान लिया और यह भी मान लिया की इसके जप से मन और आत्मा शुद्ध होते हैं I यह सिर्फ एक धुंधली तस्वीर थी I

योगी की अभिलाषा थी की हम सभी इस महानाद को अपने अंतर में सुनें और कल कल करते अस्तित्त्व के झरने को पियें I योगी की उत्कंठा थी की हम भी निर्वाण, मोक्ष और मुक्ति का आनंद लें --जैसे उसने लिया था I इस कल्याण की सरिता का जल पीकर हम सर्वशक्तिमान हो गए होते I पर हम साधारण ही बनें रहे I

योगी ने भरसक प्रयास किया और जैसा की लेख के आगे के भाग में बताया गया है, योगी ने ॐ का चित्र भी हमें दिया ताकि हम कभी इसे न भूलें I